पंचांग 30 अक्टूबर 1998
तिथि और स्थान चुनें — सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक तिथि, नक्षत्र, योग, करण, राहु काल और चौघड़िया। गणना आपके फ़ोन पर ही होती है।
स्थान
तिथि (तारीख)
30 अक्टूबर 1998 · शुक्रवार
पुणे — Pune, Maharashtra · समय इस स्थान के समय-क्षेत्र में (Asia/Kolkata)
इस महीने का पंचांग (कैलेंडर) सूर्योदय06:33
सूर्यास्त18:02
चंद्रोदय14:25
चंद्रास्त02:20 (31 अक्टू॰)
- मास:
- कार्तिक (अमांत)
- संवत:
- शक 1920 · विक्रम (चैत्रादि) 2055
- संवत्सर:
- बहुधान्य (शक-आधारित, महाराष्ट्र/दक्षिण परंपरा)
- ऋतु · अयन:
- शरद · दक्षिणायन
- सूर्य राशि:
- तुला
- चंद्र राशि:
- कुंभ
पंचांग के अंग — सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक
- वार
- शुक्रवार
- तिथि
- शुक्ल दशमी 03:00 (31 अक्टू॰) तक, फिर शुक्ल एकादशी 00:46 (1 नव॰) तक
- नक्षत्र
- धनिष्ठा 15:21 तक, फिर शतभिषा 14:11 (31 अक्टू॰) तक
- योग
- वृद्धि 02:44 (31 अक्टू॰) तक, फिर ध्रुव 23:45 (31 अक्टू॰) तक
- करण
- तैतिल 15:50 तक, फिर गर 03:00 (31 अक्टू॰) तक, फिर वणिज 13:58 (31 अक्टू॰) तक
मुहूर्त-काल
- अभिजित मुहूर्त11:55 – 12:41
- राहु काल10:51 – 12:18
- यमगंड15:10 – 16:36
- गुलिक काल07:59 – 09:25
राहु काल, यमगंड और गुलिक परंपरा में नए शुभ कार्य के आरंभ के लिए टाले जाने वाले काल हैं — रोज़ के काम के लिए डरने का कारण नहीं।
चौघड़िया
दिन
- चर(सामान्य)06:33 – 07:59
- लाभ(शुभ)07:59 – 09:25
- अमृत(शुभ)09:25 – 10:51
- काल(वर्जित (परंपरा))10:51 – 12:18
- शुभ(शुभ)12:18 – 13:44
- रोग(वर्जित (परंपरा))13:44 – 15:10
- उद्वेग(वर्जित (परंपरा))15:10 – 16:36
- चर(सामान्य)16:36 – 18:02
रात
- रोग(वर्जित (परंपरा))18:02 – 19:36
- काल(वर्जित (परंपरा))19:36 – 21:10
- लाभ(शुभ)21:10 – 22:44
- उद्वेग(वर्जित (परंपरा))22:44 – 00:18 (31 अक्टू॰)
- शुभ(शुभ)00:18 (31 अक्टू॰) – 01:52 (31 अक्टू॰)
- अमृत(शुभ)01:52 (31 अक्टू॰) – 03:26 (31 अक्टू॰)
- चर(सामान्य)03:26 (31 अक्टू॰) – 04:59 (31 अक्टू॰)
- रोग(वर्जित (परंपरा))04:59 (31 अक्टू॰) – 06:33 (31 अक्टू॰)
पुस्तक: पंचांग स्थान, सूर्योदय, समय-क्षेत्र और अयनांश पर निर्भर है — संस्कार, पर्व या मुहूर्त के लिए प्रकाशित स्थानीय पंचांग से समय सत्यापित करें।
निरयन लाहिड़ी अयनांश; सूर्योदय-सूर्यास्त सूर्य-बिंब के ऊपरी किनारे से, वायुमंडलीय अपवर्तन सहित। प्रकाशित पंचांगों से 1–2 मिनट का अंतर संभव।
पुस्तक में:विस्तार 4 · पंचांग, तिथि, योग और करण · पृष्ठ 123
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