पंचांग 3 अक्टूबर 2005

तिथि और स्थान चुनें — सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक तिथि, नक्षत्र, योग, करण, राहु काल और चौघड़िया। गणना आपके फ़ोन पर ही होती है।

स्थान
तिथि (तारीख)

3 अक्टूबर 2005 · सोमवार

पुणे — Pune, Maharashtra · समय इस स्थान के समय-क्षेत्र में (Asia/Kolkata)

इस महीने का पंचांग (कैलेंडर)
सूर्योदय06:25
सूर्यास्त18:21
चंद्रोदयनहीं
चंद्रास्त18:21
मास:
भाद्रपद (अमांत) · आश्विन (पूर्णिमांत)
संवत:
शक 1927 · विक्रम (चैत्रादि) 2062
संवत्सर:
पार्थिव (शक-आधारित, महाराष्ट्र/दक्षिण परंपरा)
ऋतु · अयन:
वर्षा · दक्षिणायन
सूर्य राशि:
कन्या
चंद्र राशि:
कन्या

पंचांग के अंग — सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक

वार
सोमवार
तिथि
कृष्ण अमावस्या 15:58 तक, फिर शुक्ल प्रतिपदा 16:56 (4 अक्टू॰) तक
नक्षत्र
हस्त 05:21 (4 अक्टू॰) तक, फिर चित्रा 06:41 (5 अक्टू॰) तक
योग
ब्रह्म 17:00 तक, फिर इन्द्र 16:42 (4 अक्टू॰) तक
करण
नाग 15:58 तक, फिर किंस्तुघ्न 04:30 (4 अक्टू॰) तक, फिर बव 16:56 (4 अक्टू॰) तक

मुहूर्त-काल

  • अभिजित मुहूर्त11:59 – 12:47
  • राहु काल07:54 – 09:24
  • यमगंड10:53 – 12:23
  • गुलिक काल13:52 – 15:22

राहु काल, यमगंड और गुलिक परंपरा में नए शुभ कार्य के आरंभ के लिए टाले जाने वाले काल हैं — रोज़ के काम के लिए डरने का कारण नहीं।

चौघड़िया

दिन

  • अमृत(शुभ)06:25 – 07:54
  • काल(वर्जित (परंपरा))07:54 – 09:24
  • शुभ(शुभ)09:24 – 10:53
  • रोग(वर्जित (परंपरा))10:53 – 12:23
  • उद्वेग(वर्जित (परंपरा))12:23 – 13:52
  • चर(सामान्य)13:52 – 15:22
  • लाभ(शुभ)15:22 – 16:52
  • अमृत(शुभ)16:52 – 18:21

रात

  • चर(सामान्य)18:21 – 19:52
  • रोग(वर्जित (परंपरा))19:52 – 21:22
  • काल(वर्जित (परंपरा))21:22 – 22:53
  • लाभ(शुभ)22:53 – 00:23 (4 अक्टू॰)
  • उद्वेग(वर्जित (परंपरा))00:23 (4 अक्टू॰) – 01:54 (4 अक्टू॰)
  • शुभ(शुभ)01:54 (4 अक्टू॰) – 03:24 (4 अक्टू॰)
  • अमृत(शुभ)03:24 (4 अक्टू॰) – 04:55 (4 अक्टू॰)
  • चर(सामान्य)04:55 (4 अक्टू॰) – 06:25 (4 अक्टू॰)

पुस्तक: पंचांग स्थान, सूर्योदय, समय-क्षेत्र और अयनांश पर निर्भर है — संस्कार, पर्व या मुहूर्त के लिए प्रकाशित स्थानीय पंचांग से समय सत्यापित करें।

निरयन लाहिड़ी अयनांश; सूर्योदय-सूर्यास्त सूर्य-बिंब के ऊपरी किनारे से, वायुमंडलीय अपवर्तन सहित। प्रकाशित पंचांगों से 1–2 मिनट का अंतर संभव।

पुस्तक में:विस्तार 4 · पंचांग, तिथि, योग और करण · पृष्ठ 123

अपनी कुंडली देखें