पंचांग 17 अक्टूबर 2044

तिथि और स्थान चुनें — सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक तिथि, नक्षत्र, योग, करण, राहु काल और चौघड़िया। गणना आपके फ़ोन पर ही होती है।

स्थान
तिथि (तारीख)

17 अक्टूबर 2044 · सोमवार

पुणे — Pune, Maharashtra · समय इस स्थान के समय-क्षेत्र में (Asia/Kolkata)

इस महीने का पंचांग (कैलेंडर)
सूर्योदय06:29
सूर्यास्त18:10
चंद्रोदय03:53 (18 अक्टू॰)
चंद्रास्त15:45
मास:
आश्विन (अमांत) · कार्तिक (पूर्णिमांत)
संवत:
शक 1966 · विक्रम (चैत्रादि) 2101
संवत्सर:
रक्ताक्षी (शक-आधारित, महाराष्ट्र/दक्षिण परंपरा)
ऋतु · अयन:
शरद · दक्षिणायन
सूर्य राशि:
कन्या
चंद्र राशि:
सिंह

पंचांग के अंग — सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक

वार
सोमवार
तिथि
कृष्ण एकादशी 08:52 तक, फिर कृष्ण द्वादशी 07:28 (18 अक्टू॰) तक
नक्षत्र
मघा 11:19 तक, फिर पूर्वाफाल्गुनी 10:38 (18 अक्टू॰) तक
योग
शुक्ल 22:08 तक, फिर ब्रह्म 19:58 (18 अक्टू॰) तक
करण
बालव 08:52 तक, फिर कौलव 20:08 तक, फिर तैतिल 07:28 (18 अक्टू॰) तक

मुहूर्त-काल

  • अभिजित मुहूर्त11:56 – 12:43
  • राहु काल07:56 – 09:24
  • यमगंड10:52 – 12:19
  • गुलिक काल13:47 – 15:15

राहु काल, यमगंड और गुलिक परंपरा में नए शुभ कार्य के आरंभ के लिए टाले जाने वाले काल हैं — रोज़ के काम के लिए डरने का कारण नहीं।

चौघड़िया

दिन

  • अमृत(शुभ)06:29 – 07:56
  • काल(वर्जित (परंपरा))07:56 – 09:24
  • शुभ(शुभ)09:24 – 10:52
  • रोग(वर्जित (परंपरा))10:52 – 12:19
  • उद्वेग(वर्जित (परंपरा))12:19 – 13:47
  • चर(सामान्य)13:47 – 15:15
  • लाभ(शुभ)15:15 – 16:42
  • अमृत(शुभ)16:42 – 18:10

रात

  • चर(सामान्य)18:10 – 19:42
  • रोग(वर्जित (परंपरा))19:42 – 21:15
  • काल(वर्जित (परंपरा))21:15 – 22:47
  • लाभ(शुभ)22:47 – 00:19 (18 अक्टू॰)
  • उद्वेग(वर्जित (परंपरा))00:19 (18 अक्टू॰) – 01:52 (18 अक्टू॰)
  • शुभ(शुभ)01:52 (18 अक्टू॰) – 03:24 (18 अक्टू॰)
  • अमृत(शुभ)03:24 (18 अक्टू॰) – 04:56 (18 अक्टू॰)
  • चर(सामान्य)04:56 (18 अक्टू॰) – 06:29 (18 अक्टू॰)

पुस्तक: पंचांग स्थान, सूर्योदय, समय-क्षेत्र और अयनांश पर निर्भर है — संस्कार, पर्व या मुहूर्त के लिए प्रकाशित स्थानीय पंचांग से समय सत्यापित करें।

निरयन लाहिड़ी अयनांश; सूर्योदय-सूर्यास्त सूर्य-बिंब के ऊपरी किनारे से, वायुमंडलीय अपवर्तन सहित। प्रकाशित पंचांगों से 1–2 मिनट का अंतर संभव।

पुस्तक में:विस्तार 4 · पंचांग, तिथि, योग और करण · पृष्ठ 123

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