पंचांग 31 अक्टूबर 2007
तिथि और स्थान चुनें — सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक तिथि, नक्षत्र, योग, करण, राहु काल और चौघड़िया। गणना आपके फ़ोन पर ही होती है।
स्थान
तिथि (तारीख)
31 अक्टूबर 2007 · बुधवार
पुणे — Pune, Maharashtra · समय इस स्थान के समय-क्षेत्र में (Asia/Kolkata)
इस महीने का पंचांग (कैलेंडर) सूर्योदय06:33
सूर्यास्त18:02
चंद्रोदय23:06
चंद्रास्त11:52
- मास:
- आश्विन (अमांत) · कार्तिक (पूर्णिमांत)
- संवत:
- शक 1929 · विक्रम (चैत्रादि) 2064
- संवत्सर:
- सर्वजित (शक-आधारित, महाराष्ट्र/दक्षिण परंपरा)
- ऋतु · अयन:
- शरद · दक्षिणायन
- सूर्य राशि:
- तुला
- चंद्र राशि:
- मिथुन 23:32 तक, फिर कर्क
पंचांग के अंग — सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक
- वार
- बुधवार
- तिथि
- कृष्ण षष्ठी 15:51 तक, फिर कृष्ण सप्तमी 14:56 (1 नव॰) तक
- नक्षत्र
- पुनर्वसु 05:28 (1 नव॰) तक, फिर पुष्य 05:41 (2 नव॰) तक
- योग
- सिद्ध 17:01 तक, फिर साध्य 15:09 (1 नव॰) तक
- करण
- वणिज 15:51 तक, फिर विष्टि 03:17 (1 नव॰) तक, फिर बव 14:56 (1 नव॰) तक
मुहूर्त-काल
- अभिजित मुहूर्त11:55 – 12:41परंपरा में बुधवार को अभिजित नहीं लिया जाता
- राहु काल12:18 – 13:44
- यमगंड07:59 – 09:25
- गुलिक काल10:51 – 12:18
राहु काल, यमगंड और गुलिक परंपरा में नए शुभ कार्य के आरंभ के लिए टाले जाने वाले काल हैं — रोज़ के काम के लिए डरने का कारण नहीं।
चौघड़िया
दिन
- लाभ(शुभ)06:33 – 07:59
- अमृत(शुभ)07:59 – 09:25
- काल(वर्जित (परंपरा))09:25 – 10:51
- शुभ(शुभ)10:51 – 12:18
- रोग(वर्जित (परंपरा))12:18 – 13:44
- उद्वेग(वर्जित (परंपरा))13:44 – 15:10
- चर(सामान्य)15:10 – 16:36
- लाभ(शुभ)16:36 – 18:02
रात
- उद्वेग(वर्जित (परंपरा))18:02 – 19:36
- शुभ(शुभ)19:36 – 21:10
- अमृत(शुभ)21:10 – 22:44
- चर(सामान्य)22:44 – 00:18 (1 नव॰)
- रोग(वर्जित (परंपरा))00:18 (1 नव॰) – 01:52 (1 नव॰)
- काल(वर्जित (परंपरा))01:52 (1 नव॰) – 03:26 (1 नव॰)
- लाभ(शुभ)03:26 (1 नव॰) – 05:00 (1 नव॰)
- उद्वेग(वर्जित (परंपरा))05:00 (1 नव॰) – 06:34 (1 नव॰)
पुस्तक: पंचांग स्थान, सूर्योदय, समय-क्षेत्र और अयनांश पर निर्भर है — संस्कार, पर्व या मुहूर्त के लिए प्रकाशित स्थानीय पंचांग से समय सत्यापित करें।
निरयन लाहिड़ी अयनांश; सूर्योदय-सूर्यास्त सूर्य-बिंब के ऊपरी किनारे से, वायुमंडलीय अपवर्तन सहित। प्रकाशित पंचांगों से 1–2 मिनट का अंतर संभव।
पुस्तक में:विस्तार 4 · पंचांग, तिथि, योग और करण · पृष्ठ 123
अपनी कुंडली देखें